नाडा तोड़ने से लेकर पीड़िता को ही दोषी ठहराने तक, रेप केस में जजों की अजीब दलीलें! ज्यूडिशरी में ये क्या हो रहा है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो फैसलों में रेप के प्रयास को नकारा गया, पीड़िता को जिम्मेदार ठहराया गया—क्या न्याय अब पीड़ितों के खिलाफ हो गया?
रेप मामलों को लेकर पिछले कुछ समय में आए अदालती फैसलों ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में जजों की टिप्पणियों ने न सिर्फ कानूनी हलकों में बहस छेड़ दी, बल्कि आम लोगों के मन में भी सवाल उठा दिए। पहले मामले में कोर्ट ने कहा कि किसी लड़की के ब्रेस्ट को पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना "रेप का प्रयास" नहीं है। अब ऐसे ही दूसरे मामले में एक कॉलेज छात्रा के साथ रेप के आरोपी को जमानत देते हुए जज ने कहा कि पीड़िता ने "खुद मुसीबत को आमंत्रित किया।" ये फैसले न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या न्यायपालिका अब पीड़ितों को दोष देने की राह पर चल पड़ी है? क्या ऐसे फैसलों से अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा और पीड़िताओं का भरोसा टूटेगा? आइए, इन मामलों को विस्तार से समझते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह घटना "तैयारी" की श्रेणी में आती है, "रेप के प्रयास" में नहीं। जज का तर्क था कि रेप का प्रयास साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने तैयारी से आगे बढ़कर कोई ठोस कदम उठाया हो। यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ रेप की धारा हटाकर IPC की धारा 354B (छेड़छाड़) और POCSO की धारा 9/10 (अग्रवेटेड सेक्शुअल असॉल्ट) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया। इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई और इसे "संवेदनहीन" बताते हुए रोक लगा दी। इस मामले में जज ने कहा कि पीड़िता एक पढ़ी-लिखी छात्रा थी, उसे अपने फैसलों की समझ थी। देर रात तक शराब पीना और पुरुष मित्र के साथ जाना—यह सब उसकी अपनी पसंद था। मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन टूटने की बात आई, लेकिन डॉक्टर ने रेप की पुष्टि नहीं की। कोर्ट ने माना कि आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और वह महीनों से जेल में था। जज की टिप्पणी थी कि वह खुद इस स्थिति के लिए जिम्मेदार थी।" इस फैसले ने पीड़िता को कटघरे में खड़ा कर दिया और बहस छेड़ दी कि क्या अब कोर्ट पीड़ितों के व्यवहार को जज करने लगे हैं? बता दें कि पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराने से लेकर मेडिकल टेस्ट तक, पीड़िता पहले ही कई मुश्किलों से गुजरती है। ऊपर से कोर्ट में ऐसी टिप्पणियाँ उसे और तोड़ सकती हैं। पहले पुलिस के सवाल, फिर मेडिकल की प्रक्रिया और अब कोर्ट का रवैया—क्या कोई पीड़िता इन सबके बाद हिम्मत जुटा पाएगी कि वह इंसाफ माँगने जाए?