अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद की आखिरी लड़ाई! अंग्रेजों से कैसे लिया था बदला? जानिए पूरी कहानी!
साल 1931, अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद। चंद्रशेखर आज़ाद पर पुलिस ने हमला किया। घायल होने के बाद भी उन्होंने बहादुरी से लड़ते हुए खुद को गोली मार ली।
साल 1925 में चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में एक ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया। इस घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई और क्रांतिकारियों की तलाश शुरू हो गई। एक-एक कर कई क्रांतिकारी पकड़े गए। कुछ को फांसी दी गई, कुछ को कालापानी की सजा हुई, तो कुछ को लंबी कैद का सामना करना पड़ा। लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद को पकड़ना अंग्रेजों के लिए नामुमकिन साबित हुआ, भले ही उन्होंने उनके सिर पर 5000 रुपये का इनाम रखा था। काकोरी कांड में अशफाकउल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, शचींद्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुंदी लाल, मुरारी लाल, केशव चक्रवर्ती और बनवारी लाल जैसे कई क्रांतिकारी शामिल थे। घटना के 47 दिन बाद, अंग्रेजों ने यूपी के कई इलाकों में छापेमारी कर अधिकतर क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से चार को फांसी दी गई, चार को कालापानी भेजा गया और 17 को लंबी कैद मिली। लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद और कुंदन लाल को अंग्रेज कभी पकड़ नहीं पाए। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। अंग्रेज अफसर ने मौलश्री के पेड़ की आड़ ले ली, जबकि उसके सिपाही नाले में छिप गए। उधर, आजाद और सुखदेवराज ने जामुन के पेड़ की ओट ली। इसी बीच, आजाद को गोली लग गई। उन्होंने सुखदेवराज से कहा, "मुझे जांघ में गोली लगी है, तुम यहां से निकल जाओ।" आदेश सुनते ही सुखदेवराज वहां से भाग निकले। पार्क से बाहर निकलकर, उन्होंने एक लड़के को पिस्तौल दिखाकर उसकी साइकिल ली और तेजी से चांद प्रेस पहुंच गए। नॉट बावर ने बताया कि जब भी मैं दिखता, आज़ाद तुरंत गोली चला देते। आखिरकार, वे पीठ के बल गिर गए। तभी एक कॉन्स्टेबल शॉटगन लेकर आया, लेकिन हमें यह नहीं पता था कि आज़ाद जिंदा हैं या नहीं। इसलिए मैंने कॉन्स्टेबल से कहा कि वह उनके पैर पर गोली चलाए। जैसे ही उसने गोली चलाई, मैं पास गया और देखा कि आज़ाद की मौत हो चुकी थी, जबकि उनका साथी भाग चुका था। इस बीच, एसपी मेजर को गोलीबारी की खबर मिल चुकी थी, और उसने सशस्त्र रिजर्व पुलिस के जवानों को अल्फ्रेड पार्क भेजा। लेकिन तब तक मुठभेड़ खत्म हो चुकी थी। नॉट बावर के आदेश पर जब आज़ाद का शव लिया गया, तो उनके पास से 448 रुपये और 16 गोलियां मिलीं।