Bulldozer Action: प्रयागराज बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 10-10 लाख का मुआवजा देने का आदेश

Bulldozer Action: यूपी के प्रयागराज में वर्ष 2021 में हुए बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

Update: 2025-04-01 10:41 GMT
Bulldozer Action: यूपी के प्रयागराज में वर्ष 2021 में हुए बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि यह नागरिक अधिकारों का असंवेदनशील तरीके से हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि घर ध्वस्त करने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं थी और इसमें उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

24 घंटे के भीतर चला बुलडोजर

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उन्हें 1 मार्च 2021 को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन यह उन्हें 6 मार्च को मिला। इसके अगले ही दिन, यानी 7 मार्च को, प्रशासन ने उनके मकानों पर बुलडोजर चला दिया। याचिकाकर्ताओं में एक वकील, एक प्रोफेसर और तीन महिलाएं शामिल थीं, जिनके घरों को बिना उचित प्रक्रिया अपनाए गिरा दिया गया।

कोर्ट- 'असंवेदनशीलता का प्रदर्शन'

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह की मनमानी कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है और यह सरकार की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा, "यह हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है। नागरिकों के पास आश्रय का अधिकार होता है और इस अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।"

पीड़ितों को मिलेगा मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को आदेश दिया है कि इस अवैध कार्रवाई से प्रभावित पांचों याचिकाकर्ताओं को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। अदालत ने कहा कि यह मुआवजा उन अमानवीय और गैरकानूनी कार्रवाइयों की भरपाई के लिए दिया जा रहा है, जिनके कारण लोगों को अपने घर खोने पड़े।

बच्ची के वीडियो ने किया विचलित

सुनवाई के दौरान जस्टिस उज्जल भुइयां ने यूपी के अंबेडकर नगर में हाल ही में हुई एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान जब झोपड़ियों को गिराया जा रहा था, तब एक 8 साल की बच्ची अपनी किताबें लेकर भाग रही थी। इस तस्वीर ने सभी को झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, जहां लोग आश्रय के अधिकार से भी वंचित किए जा रहे हैं।

राज्य सरकार ने किया बचाव

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि प्रशासन ने उचित प्रक्रिया का पालन किया था। उन्होंने तर्क दिया कि बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे होने के कारण राज्य सरकार के लिए अतिक्रमण हटाना और इसे रोकना एक कठिन कार्य है।

हाईकोर्ट के बाद पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

इस मामले में याचिकाकर्ताओं, जिनमें अधिवक्ता जुल्फिकार हैदर और प्रोफेसर अली अहमद शामिल हैं, ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया।

न्याय की जगी उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन लोगों के लिए न्याय की उम्मीद जगी है, जो बिना उचित प्रक्रिया के अपने घरों से बेदखल कर दिए जाते हैं। यह निर्णय एक मिसाल बन सकता है और प्रशासन को भविष्य में ऐसी कार्रवाई करने से पहले कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए बाध्य कर सकता है। यह भी पढ़ें: Prashant Kishor News: पीएम मोदी बिहार की जनता से वोट लेकर गुजरात में फैक्ट्री लगा रहे हैं - प्रशांत किशोर

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