Masan Ki Holi 2026: कल खेली जाएगी काशी में चिता के राख से होली, जानें इसका पौराणिक इतिहास

शैव परंपराओं में निहित यह होली जीवन, मृत्यु और मुक्ति के दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है।

Update: 2026-02-27 10:18 GMT

Masan Ki Holi 2026: भारत की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी अपने असाधारण और गहरे प्रतीकात्मक त्योहारों के लिए प्रसिद्ध है। इनमें से मसान की होली सबसे अनोखी और रहस्यमयी उत्सवों में से एक है। पूरे भारत में खेली जाने वाली रंगीन होली के विपरीत, मसान की होली वाराणसी के श्मशान घाटों में अंतिम संस्कार की चिताओं की राख से मनाई जाती है। शैव परंपराओं में निहित यह होली जीवन, मृत्यु और मुक्ति के दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है।

कब है मसान की होली?

काशी में रंगभरी एकादशी के अगले दिन मसान होली खेली जाती है। इस साल रंगभरी एकादशी आज 27 फरवरी को है। इसके अगले दिन यानी कल, शनिवार 28 फरवरी 2026 को मसान होली खेली जाएगी। मसान होली काशी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाती है।

मसान की होली का इतिहास

मसान की होली की परंपरा भगवान शिव से गहराई से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, भगवान शिव, जिन्हें श्मशान घाटों और वैराग्य के देवता के रूप में भी जाना जाता है, काशी में निवास करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, होलिका दहन के बाद, भगवान शिव और उनके भक्त सांसारिक मोह-माया से विरक्ति का प्रतीक दिखाने के लिए श्मशान घाट में होली खेलते हैं।

"मसान" शब्द का अर्थ श्मशान घाट है। ऐसा कहा जाता है कि यह उत्सव शिव द्वारा जीवन और मृत्यु को एक ही ब्रह्मांडीय वास्तविकता के दो पहलुओं के रूप में स्वीकार करने का प्रतीक है। सदियों से तपस्वियों, अघोरियों और शैव साधुओं ने इस परंपरा को जीवित रखा है।

मसान की होली का धार्मिक महत्व

हिंदू दर्शन में वाराणसी को मोक्ष का नगर माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष प्राप्त होता है। मसान की होली इस मान्यता को और मजबूत करती है, क्योंकि यह जीवन और मृत्यु के चक्र का निर्भयतापूर्वक उत्सव मनाती है।

यह त्योहार अघोरी संप्रदाय से भी गहराई से जुड़ा हुआ है, जो भगवान शिव की उनके सबसे उग्र और त्यागी रूप में पूजा करते हैं। उनकी भागीदारी उत्सव में एक रहस्यमय आयाम जोड़ती है।

क्यों खेली जाती है मसान की होली?

माना जाता है कि काशी में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा की शुरुआत स्वयं भगवान शिव ने स्वयं की थी। बताया जाता है शिव जी अपने विवाह के उपरांत पहली बार काशी पहुंचे थे। इस दिन को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है और उस दिन लोगों ने होली खेलकर खुशियां मनाई थीं। इस उत्सव में सारे देवी-देवता इकट्ठा हुए थे।

धार्मिक ग्रंथों इस मौके पर शंकर भगवान के प्रिय गण भूत-प्रेत, यक्ष और गंधर्व इस उत्सव से वंचित रह गए। इसके बाद भोलेनाथ ने फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पर मणिकर्णिका घाट पर श्मशान में अपने गणों के साथ के साथ भस्म की होली खेली थी। यहीं से काशी में मसान की राख से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है।

Tags:    

Similar News