आज वाराणसी में मनाई जाएगी रंगभरी एकादशी, इसी के साथ हो जाएगी होली की शुरुआत
रंगभरी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष में पड़ती है और काशी में इसका विशेष महत्व है। इस दिन भक्त पवित्र आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं, जिसे भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है।
Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के सबसे आध्यात्मिक महत्व वाले दिनों में से एक है और वाराणसी में होली उत्सव की प्रतीकात्मक शुरुआत का प्रतीक है। यह त्योहार वैष्णव और शैव परंपराओं का सुंदर मिश्रण है, जिसमें भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव और देवी पार्वती का भी सम्मान किया जाता है।
रंगभरी एकादशी क्या है?
रंगभरी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष में पड़ती है और काशी में इसका विशेष महत्व है। इस दिन भक्त पवित्र आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं, जिसे भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है।
वाराणसी में, यह त्योहार भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह के बाद काशी लौटने की दिव्य कथा से जुड़ा है। यह उत्सव रंगारंग शोभायात्राओं, मंदिर की पूजा-अर्चना और गुलाल के साथ मनाया जाता है, विशेष रूप से प्रतिष्ठित काशी विश्वनाथ मंदिर में, जो होली के आगमन का प्रतीक है।
रंगभरी एकादशी का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिंदू मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी भगवान शिव से विवाह के बाद देवी पार्वती के काशी में दिव्य आगमन का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य विवाह के बाद, बाबा विश्वनाथ इसी शुभ दिन माता पार्वती को अपने नगर काशी में लाए थे। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन से भगवान शिव काशी में होली खेलना शुरू करते हैं, और पूरा नगर भक्तिमय रंगों और उत्सव में सराबोर हो जाता है।
रंगभरी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
रंगभरी एकादशी का गहरा आध्यात्मिक महत्व है:
शिव और शक्ति का मिलन- यह दिन शिव और पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है, जो पुरुष और स्त्री ऊर्जाओं के बीच ब्रह्मांडीय संतुलन और सामंजस्य को दर्शाता है।
होली का प्रारंभ- अन्य स्थानों के विपरीत जहाँ होली की शुरुआत होलिका दहन से होती है, वाराणसी में उत्सव के रंग रंगभरी एकादशी से शुरू होते हैं। भक्त भक्ति भाव से बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित करते हैं।
एकादशी और विष्णु पूजा- यद्यपि यह एकादशी के दिन पड़ती है, इसलिए यह दिन भगवान विष्णु के भक्तों के लिए भी पवित्र माना जाता है। इस दिन उपवास और प्रार्थना करने से पाप धुल जाते हैं और आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है।
वाराणसी में रंगभरी एकादशी पर क्या होता है?
सबसे भव्य उत्सव काशी विश्वनाथ मंदिर में मनाया जाता है। जानिए इसे खास क्या बनाता है:
भव्य शोभायात्रा- नगर में एक जीवंत शोभायात्रा निकाली जाती है जिसमें देवी पार्वती की प्रतिमा को विधिपूर्वक भगवान शिव से मिलवाया जाता है। भक्त भजन गाते हैं, “हर हर महादेव” का जाप करते हैं और भक्ति भाव से गुलाल बरसाते हैं।
बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेलना- भक्त मंदिर परिसर में प्रतीकात्मक रूप से भगवान शिव के साथ होली खेलते हैं। देवता को गुलाल और फूल अर्पित किए जाते हैं, जो काशी में होली की आध्यात्मिक शुरुआत का प्रतीक है।
मंदिर के अनुष्ठान और विशेष आरती- विशेष पूजा और आरती की जाती है। पुजारी मंदिर को रंगों और फूलों से सजाते हैं। पूरा वातावरण उत्सवपूर्ण और भक्तिमय हो जाता है।
वाराणसी में रंगभरी एकादशी की विशिष्टता
यद्यपि एकादशी पूरे भारत में मनाई जाती है, काशी में रंगभरी एकादशी की एक विशेष सांस्कृतिक पहचान है। यह त्योहार भक्ति, पौराणिक कथाओं और उत्सव का सुंदर संगम है। यह निम्नलिखित का प्रतीक है:
- देवी पार्वती का उनके ससुराल में स्वागत
- पवित्र होली उत्सव का प्रारंभ
- एक शक्तिशाली आध्यात्मिक शुद्धि का दिन
- भगवान शिव का आनंदमय रूप
यह उत्सव काशी की भावना को दर्शाता है — जहाँ आध्यात्मिकता और उत्सव का संगम होता है।