Chaiti Chhath 2026: चैती छठ का आज दूसरा दिन, खरना के साथ शुरू होगा 36 घंटे का निर्जला उपवास
खरना का महत्व इसकी पवित्रता, अनुशासन और भक्ति के संदेश में निहित है। ऐसा माना जाता है कि इस अनुष्ठान को सच्चे और पवित्र हृदय से करने पर परिवार में शांति, समृद्धि और खुशहाली आती है।
Chaiti Chhath 2026: चैती छठ का चार दिवसीय महापर्व रविवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। आज छठ का दूसरा दिन है। इस दिन को खरना के रूप में मनाया जाता है। सोमवार को खरना के बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होगा। कल मंगलवार को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जायेगा। वहीँ 25 मार्च को उगे हुए सूर्य को अर्घ्य के साथ ही इस महापर्व का समापन होगा।
खरना का महत्व और अनुष्ठान
'खरना' चैती छठ उत्सव के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है। यह चार दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दूसरे दिन मनाया जाता है और मुख्य उपवास काल की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन, भक्त—विशेष रूप से महिलाएं—पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए कठोर उपवास रखती हैं, और सूर्यास्त के बाद भगवान सूर्य और छठी मैया को प्रसाद अर्पित करके ही अपना व्रत तोड़ती हैं।
खरना का महत्व इसकी पवित्रता, अनुशासन और भक्ति के संदेश में निहित है। ऐसा माना जाता है कि इस अनुष्ठान को सच्चे और पवित्र हृदय से करने पर परिवार में शांति, समृद्धि और खुशहाली आती है। शाम को पूजा-अर्चना के बाद, भक्त विशेष प्रकार का प्रसाद तैयार करते हैं, जिसमें गुड़ की खीर, रोटी और फल शामिल होते हैं। यह प्रसाद सबसे पहले देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है, और उसके बाद भक्त दिन भर के उपवास को समाप्त करने के लिए इसे ग्रहण करते हैं।
खरना के अनुष्ठान अत्यंत स्वच्छता और पवित्रता के साथ संपन्न किए जाते हैं। घर और रसोई की अच्छी तरह से साफ-सफाई की जाती है, और प्रसाद को भी पूरी शुद्धता के साथ तैयार किया जाता है। खरना के बाद, भक्त 36 घंटे का 'निर्जला' (बिना जल के) उपवास शुरू करते हैं, जो छठ उत्सव के अंतिम दिन तक जारी रहता है। यही कारण है कि खरना चैती छठ का एक अत्यंत आध्यात्मिक और अनिवार्य अंग माना जाता है।
चैती छठ खरना और अर्घ्य का समय
खरना पूजा: शाम 6:01 बजे से 7:29 बजे तक
अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य (24 मार्च): शाम 6:02 बजे तक
उदीयमान सूर्य को अर्घ्य (25 मार्च) : सुबह 5:57 बजे के बाद
चैती छठ के तीसरे दिन 24 मार्च को व्रती डूबते हुए या अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके लिए श्रद्धालु जलाशयों पर एकत्र होंगे और विधि-विधान से पूजा करेंगे। वहीं अंतिम दिन 25 मार्च को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर इस महापर्व का समापन होगा।