सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता को रखा बरकरार

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।

Shiwani Singh
Published on: 17 Oct 2024 12:57 PM IST
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता को रखा बरकरार
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सुप्रीम कोर्ट ने सिटीजनशिप एक्ट 1995 की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने का फैसला सुनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ और तीन अन्य न्यायाधीशों ने इस प्रावधान की वैधता को सही ठहराया, जबकि न्यायमूर्ति पारदीवाला ने असहमति जताई। बता कें कि सिटीजनशिप एक्ट 1955 की धार 6A के मुताबिक 1 जनवरी 1966 और 25 मार्च 1971 के बीच असम में प्रवेश करने वाले अप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करती है।

CJI ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान CJI डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि असम समझौता बांग्लादेश के निर्माण के बाद अवैध प्रवास की समस्या का एक राजनीतिक समाधान था और धारा 6A इसका कानूनी समाधान है। बहुमत के फैसले में यह भी कहा गया कि 25 मार्च 1971 की अंतिम तिथि तर्कसंगत है, क्योंकि यह बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समाप्त होने की तिथि थी।

'सरकार अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान करें'

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान करने को कहा है। कोर्ट ने इनके निर्वासन के लिए असम में तत्कालीन सर्बानंद सोनोवाल सरकार में NRC को लेकर दिए गए निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने की बात कही है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अब से इस पहचान और निर्वासन प्रक्रिया की निगरानी करेगा।

'सिद्धांत है, जियो और जीने दो'

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कह, "हम किसी को अपने पड़ोसी चुनने की अनुमति नहीं दे सकते, क्योंकि यह बंधुत्व के सिद्धांत के खिलाफ है। सिद्धांत है, जियो और जीने दो।" कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य में विभिन्न जातीय समूहों की केवल उपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि अनुच्छेद 29(1) का उल्लंघन हो रहा है। बता दें कि अनुच्छेद 29(1)  व्यक्तियों को अपनी अलग भाषा, लिपि या संस्कृति रखने का अधिकार प्रदान करता है।

'1966 से पहले प्रवेश करने वालों को नागरिक माना जाए '

न्यायमूर्ति कांत ने कहा, "जो प्रवासी 1 जनवरी 1966 से पहले असम में प्रवेश कर चुके हैं, उन्हें भारतीय नागरिक माना जाएगा। कांत ने कहा आगे कहा जो प्रवासी 1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच असम में प्रवेश करते हैं, वे भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए पात्र हैं, बशर्ते वे पात्रता मानदंडों को पूरा करें। बेंच ने कहा कि जो प्रवासी 25 मार्च 1971 या उसके बाद असम में प्रवेश करते हैं, उन्हें पहचानने, हिरासत में लेने और निर्वासित किए जाने का जोखिम होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असम में स्थानीय जनसंख्या के बीच प्रवासियों का प्रतिशत बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है और इस प्रकार असम को अलग करना "तर्कसंगत" है। कोर्ट ने कहा, "असम में 40 लाख प्रवासियों का प्रभाव पश्चिम बंगाल में 57 लाख प्रवासियों की तुलना में अधिक है, क्योंकि असम का भू-क्षेत्र पश्चिम बंगाल की तुलना में बहुत कम है,"

न्यायाधीश पारदीवाला ने असहमति जताई

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अपनी असहमति जताते हुए धारा 6A को असंवैधानिक घोषित किया। उन्होंने कहा "धारा 6A ने समय के साथ असंवैधानिकता प्राप्त कर ली है।'' न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि विधायिका सरलता से किसी को भी 1971 से पहले नागरिकता प्रदान कर सकती थी। उन्होंने कहा कि 1966 से 1971 के बीच एक वैधानिक श्रेणी का निर्माण राज्य में आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। उन्होंने कहा, "यह तथ्य कि 1966 से 1971 के बीच एक वैधानिक श्रेणी बनाई गई, जिसे एक कड़े शर्त (10 वर्षों के लिए मतदान का अधिकार नहीं) के अधीन किया गया का अर्थ होगा कि नागरिकता का कन्फर्मेंट वास्तव में असम के लोगों को यह आश्वस्त करने के लिए था कि इस प्रकार का समावेश राज्य में आगामी चुनावों को प्रभावित नहीं करेगा,"

नागरिकता अधिनियम की धारा 6A क्या है?

नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6A उन प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की अनुमति देती है, जो 1 जनवरी 1966 के बाद लेकिन 25 मार्च 1971 से पहले असम में आए थे। ये भी पढ़ेंः अब 'अंधा' नहीं है देश का कानून, 'न्याय की देवी' की आखों पर बंधी पट्टी हटाई गई
Shiwani Singh

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