बिहार की सियासत में 'तीसरी ताकत' की तलाश: क्या प्रशांत किशोर बदलेंगे खेल का मैदान?

प्रशांत किशोर अपनी पार्टी जन सुराज को ‘तीसरे विकल्प’ के तौर पर मजबूती से पेश करने की कोशिश में जुटे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या लोग इस विकल्प को अपनाने के लिए तैयार हैं?

Sunil Sharma
Published on: 11 April 2025 2:49 PM IST
बिहार की सियासत में तीसरी ताकत की तलाश: क्या प्रशांत किशोर बदलेंगे खेल का मैदान?
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बिहार की सियासी फिजा में इस वक्त हलचल तेज है। एक तरफ एनडीए और महागठबंधन के बीच सत्ता की खींचतान है, तो दूसरी तरफ प्रशांत किशोर अपनी पार्टी जन सुराज को ‘तीसरे विकल्प’ के तौर पर मजबूती से पेश करने की कोशिश में जुटे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या लोग इस विकल्प को अपनाने के लिए तैयार हैं?

बदलाव का दावा, लेकिन राह कठिन

जन सुराज पार्टी ने हाल ही में पटना में 'बिहार बदलाव रैली' का आयोजन किया, जिससे साफ है कि पार्टी बड़े इरादों के साथ मैदान में है। बिहार प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती के शब्दों में, "अब बदलाव जरूरत नहीं, जनता की मांग बन चुका है।" लेकिन यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच और व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की बात करता है। प्रशांत किशोर का सीधा इशारा है कि बिहार की राजनीति को केवल बीजेपी-जेडीयू या आरजेडी के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। वो चाहते हैं कि जनता अब किसी तीसरे विकल्प को अपनाने का हौसला दिखाए—और यह विकल्प जाहिर तौर पर जन सुराज ही है।

नीतीश और तेजस्वी पर लगातार हमले

राजनीति में आलोचना आम बात है, लेकिन प्रशांत किशोर इसे एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव पर उनके निशाने रोज़मर्रा की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। बीपीएससी घोटाले से लेकर वक्फ बिल तक, हर मसले पर उन्होंने सीधा मोर्चा खोला है। कई बार तो वो छात्रों के आंदोलन में सड़कों पर उतरे, कोर्ट और जेल तक का सामना किया—जिससे जन सुराज पार्टी को जमीनी पकड़ बनाने में थोड़ी मदद भी मिली।

जातीय राजनीति में 'बाहरी' जैसे हालात

बिहार में राजनीति और जातिवाद का नाता बेहद गहरा है। ऐसे में एक ब्राह्मण चेहरा होने के कारण प्रशांत किशोर को एक खास दायरे से बाहर निकलने में दिक्कतें आ रही हैं। अगर बिहार भी दिल्ली की तरह शहरी और मध्यम वर्गीय डेमोग्राफी वाला होता, तो शायद प्रशांत किशोर 'केजरीवाल मॉडल' को दोहराने में सफल होते। लेकिन यहां तो हालात ऐसे हैं कि जातीय जनगणना भी सियासी मुद्दा बन चुकी है। ऐसे में 'विकास' और 'प्रशासनिक सुधार' की बातें सुनने वाले कान कम और जातियों के समीकरण देखने वाले आंखें ज्यादा हैं।

बनेंगे 'वोटकटवा' या भविष्य का विकल्प?

हाल के उपचुनावों में जन सुराज ने भले ही सीटें न जीती हों, लेकिन इमामगंज और रामगढ़ जैसे क्षेत्रों में उसका प्रभाव साफ नजर आया। रामगढ़ में जीत का अंतर केवल 1,362 वोटों का था जबकि जन सुराज को 6,513 वोट मिले। वहीं इमामगंज में पार्टी ने 37,000 से ज्यादा वोट बटोरे। ये आंकड़े बताते हैं कि भले ही जन सुराज अभी निर्णायक स्थिति में न हो, लेकिन वह चुनावी गणित बिगाड़ने की स्थिति में जरूर पहुंच गया है—और यहीं से 'वोटकटवा' का तमगा उसे मिल गया। लेकिन प्रशांत किशोर इस टैग से इंकार करते हैं। उनका कहना है कि "हम सिर्फ 2025 नहीं, बल्कि 2030 के चुनाव की भी तैयारी कर रहे हैं।" यह बात एक दीर्घकालिक सोच की ओर इशारा करती है।

क्या जनता तीसरे विकल्प को देखना चाहती है?

हाल ही में आए एक सर्वे में जब लोगों से पूछा गया कि वो किसे अगला मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, तो 15% ने प्रशांत किशोर का नाम लिया। जबकि नीतीश कुमार को 18% और तेजस्वी यादव को 41% समर्थन मिला। मतलब साफ है—प्रशांत किशोर को नज़रअंदाज करना अब आसान नहीं। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि प्रशांत किशोर ने खुद को अब तक मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं बताया है, न ही उनकी पार्टी ने उन्हें इस रूप में प्रोजेक्ट किया है। इसके बावजूद लोगों की राय उनके पक्ष में आना, एक नए सियासी संकेत की तरह देखा जा सकता है।

2025 नहीं, 2030 है प्रशांत किशोर की असली मंज़िल

जन सुराज पार्टी इस वक्त संक्रमण के दौर में है—जहां वो खुद को विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है, लेकिन अभी तक जनता का भरोसा पूरी तरह नहीं जीत पाई है। एनडीए और महागठबंधन की गहरी जड़ें और जातीय समीकरणों की राजनीति में प्रशांत किशोर को अभी लंबा सफर तय करना है। लेकिन एक बात तो साफ है—बिहार की राजनीति में अब तीसरे मोर्चे की चर्चा शुरू हो चुकी है। और अगर प्रशांत किशोर अपने वादों, विचारों और रणनीतियों को जमीनी स्तर पर उतार पाते हैं, तो 2025 भले ही न सही, 2030 में जन सुराज बड़ा धमाका कर सकती है।
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