जानिए दिल्ली के रामलीला मैदान की अनोखी कहानी, कैसे बना और किसने बनाया था ये ऐतिहासिक मैदान

दिल्ली का रामलीला मैदान आज राजनीतिक आंदोलनों का बड़ा केंद्र बन गया है, मुगलों के समय में यहां हिंदू सैनिक चुपचाप रामलीला जैसे धार्मिक त्योहार मनाते थे।

Vyom Tiwari
Published on: 18 Feb 2025 2:48 PM IST
जानिए दिल्ली के रामलीला मैदान की अनोखी कहानी, कैसे बना और किसने बनाया था ये ऐतिहासिक मैदान
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दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बनने जा रहा है। लगभग 27 साल बाद, बीजेपी के मुख्यमंत्री यहां शपथ लेने जा रहे हैं। यह आयोजन दिल्ली के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाला है। रामलीला मैदान का अपना एक लंबा संघर्षपूर्ण इतिहास है। यह मैदान मुग़ल काल में अस्तित्व में आया था और यहां कई आंदोलनों और संघर्षों ने जन्म लिया। पहले रामलीला के आयोजन के लिए भी लोगों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। आज भी जब कोई बड़ा जन आंदोलन, रैली, परिवर्तन या शपथ ग्रहण समारोह होना होता है, तो यह मैदान सबसे पहले याद किया जाता है।

इस मैदान की विशेषता 

दिल्ली का रामलीला मैदान सिर्फ राम-रावण युद्ध के मंचन के लिए ही नहीं, बल्कि यहां होने वाली राजनीतिक रैलियों और भाषणों के लिए भी जाना जाता है। रामलीला के मंच पर होने वाली झांकियों की तरह, यहां से उठने वाली आवाजें देश के कोने-कोने तक पहुंचती हैं। जो संदेश यहां दिए जाते हैं, वे न केवल देश के प्रबुद्ध वर्ग की चर्चाओं में शामिल होते हैं, बल्कि राजनीतिक बदलावों पर भी असर डालते हैं। यानी, यहां से हर आवाज दूर तक जाती है। इस तरह, रामलीला मैदान का दो सौ साल पुराना इतिहास कला, संस्कृति, राजनीति और इतिहास से जुड़ा हुआ है।

बहादुर शाह जफर के शासन काल में पूरी तरह से हुआ विकसित 

दिल्ली का रामलीला मैदान आज जिस रूप में दिखाई देता है, वह आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर के शासन काल में पूरी तरह से विकसित हुआ था। हालांकि, इस स्थान का उपयोग रामलीला जैसे धार्मिक आयोजनों के लिए औरंगजेब के समय से ही होने लगा था। औरंगजेब के शासन में हिंदू सैनिकों की संख्या बहुत कम थी, जबकि बहादुर शाह जफर के समय तक हिंदू सैनिकों की संख्या काफी बढ़ गई थी। औरंगजेब की क्रूरता के कारण रामलीला मैदान कई बार तबाह हो गया था, और लोग चुपके-चुपके रामलीला का आयोजन करते थे। जब यहां पर रामलीला का आयोजन शुरू हुआ, तो बहादुर शाह जफर भी इसके बहुत बड़े फैन बन गए। अपने जुलूस के दौरान वह इस मैदान को दूर से देखा करते थे। कहते हैं कि उन्हें यहां की रौनक और खुलापन बहुत अच्छा लगता था। वह इसे अपनी शान का प्रतीक मानते थे। मतलब, बहादुर शाह जफर के शासन के आखिरी समय में ही यह स्थान रामलीला मैदान के नाम से मशहूर हो गया था, और यहां बड़े धार्मिक आयोजन होने लगे थे।

पहले बस्ती का तालाब के नाम से जाना जाता था

दिल्ली का रामलीला मैदान अजमेरी गेट के पास स्थित है, और इसका क्षेत्रफल करीब 10 एकड़ है। पहले यहां एक बड़ा तालाब हुआ करता था, जिसके चारों ओर घनी बस्तियां बसी हुई थीं। मुग़ल सेना के हिंदू सैनिकों के लिए यह जगह धार्मिक उत्सवों जैसे रामलीला मनाने के लिए असुविधाजनक थी, और वे डर-डर कर यहां आयोजन करते थे। समय के साथ, जैसे-जैसे यहां का उपयोग बढ़ा, लोग तालाब को भरते गए। पहले इसे बस्ती का तालाब कहा जाता था, क्योंकि तालाब की वजह से यह जगह जानी जाती थी। सन् 1850 के आस-पास, जब अंग्रेजों का शासन था, तो उन्होंने इस जगह को समतल किया और इसे अपनी छावनी के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। इसके बावजूद, यहां हर साल रामलीला का आयोजन होता रहा। आजकल इस जगह का उपयोग साल में सिर्फ एक बार रामलीला के लिए होता है, लेकिन सियासी गतिविधियों के कारण यह स्थान हमेशा चर्चा में रहता है।

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