Japan Naked Festivals: क्यों जापानी मनाते है यह तीन नग्न त्यौहार, वजह जानकार हो जायेंगे हैरान

Japan Naked Festivals जापान में ‘नेक्ड फेस्टिवल’के नाम से मशहूर है तीन त्यौहार, जिनमें पुरुष नग्न होकर विभिन्न धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। यह फेस्टिवल साल के अंत और नए साल की शुरुवात में आयोजित किए जाते हैं

Vyom Tiwari
Published on: 13 Dec 2024 12:32 PM IST
Japan Naked Festivals: क्यों जापानी मनाते है यह तीन नग्न त्यौहार, वजह जानकार हो जायेंगे हैरान
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Japan Naked Festivals: जापान में पूरे साल भर 'मत्सुरी' यानी त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमें से तीन त्यौहार ऐसे होते हैं जिनमें किसी चीज को छिपाने की जरूरत नहीं होती। इन्हें आमतौर पर 'नेक्ड फेस्टिवल' या नग्न त्योहार के नाम से जाना जाता है। इन त्योहारों में भाग लेने वाले पुरुष बहुत कम कपड़े पहनते हैं। जापान के कुछ प्रमुख त्योहारों में इवाते के कोकुसेकिजी, ओकायामा का सैदाईजी ईयो और फुकुशिमा का हयामा-गोमोरी खास रूप से जाने जाते हैं। इन त्योहारों को 'नेक्ड फेस्टिवल' कहा जाता है, क्योंकि इनमें हिस्सा लेने वाले मुख्य रूप से पुरुष होते हैं। इन पुरुषों के शरीर पर केवल एक सफेद रंग की लंगोट होती है, जिसे फंडोशी कहा जाता है।
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हादका मत्सुरी यानी जापान के नेक्ड फेस्टिवल

हादका-मत्सुरी जिसे नेक्ड फेस्टिवल (Japan Naked Festivals) भी कहा जाता है इस त्यौहार का मुख्य उद्देश्य पिछले साल की सारी अशुद्धियों को साफ करना और नए साल में शांति की कामना करना है। यह फेस्टिवल आमतौर पर साल के अंत और नए साल के शुरुवात में सबसे ठंडे समय में मनाया जाता है। इसमें भाग लेने वाले पुरुष शुद्धता की प्राप्ति के लिए ठंडे पानी से स्नान करते हैं और अपने शरीर से भाप निकलते हुए बाहर आते हैं। शरीर से निकलती भाप त्योहार की ऊर्जा और जोश को दिखाती है। जापान में एक पुरानी परंपरा है जिसमें लोग नग्न अवस्था में किसी आयोजन में हिस्सा लेते हैं। यह परंपरा शिंटो और बौद्ध धर्म के देवताओं से प्रार्थना करने से जुड़ी हुई है और इसका उद्देश्य शुद्धि की भावना को महसूस करना है। इसमें भाग लेने वाले लोग खुद को एक नवजात शिशु की तरह मानते हैं, जो पूरी तरह से अशुद्धियों से मुक्त होता है। इस आयोजन में शामिल होने से पहले, प्रतिभागी मांसाहार से बचते हैं और अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए बाहर जाकर पानी से स्नान करते हैं। फिर, वे अनुष्ठानिक रूप से एक-दूसरे को धक्का देते हैं और हाथापाई करते हैं। नए साल के जश्न के अंत में जो हादका-मत्सुरी होती है, उसे शूशो-ई कहा जाता है और यह पहले से कहीं ज्यादा जोरदार होती है। शूशो-ई का आयोजन लोगों की खुशी और एक बेहतर भविष्य की कामना के लिए किया जाता है। इस मौके पर लोग आपस में खूब हाथापाई करते हैं।
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इवाते में मनाया जाता है ‘सोमिन-साई’

प्राचीन कथाओं के अनुसार, सोमिन-शोराई को बीमारी और आपदाओं से बचाने वाला माना जाता है। यह विश्वास जापान में एक प्रमुख परंपरा बन गया है जिसमें लोग कागज के टुकड़े पर ‘सोमिन-शोराई के वंशज’ लिखकर उसे अपने घर के दरवाजे पर लटकाते थे। यह एक तरह की प्रार्थना होती थी, जिससे वे शांति और घटना रहित समय की कामना करते थे। समय के साथ, यह परंपरा एक त्योहार में बदल गई, जिसे ‘सोमिन-साई’ कहा जाता है। यह त्योहार खास तौर पर तोहोकू क्षेत्र और इवाते प्रान्त में मनाया जाता था। एक हज़ार साल से ज़्यादा समय से, कोकुसेकिजी के सोमिन-साई उत्सव में लोग बिना कपड़ों के हिस्सा लेते आए हैं। 2007 में यह निर्णय लिया गया कि अब से लोग लंगोटी पहनेंगे। फिर 2024 (17 फरवरी) में यह घोषणा की गई कि यह उत्सव आखिरी बार मनाया जाएगा, क्योंकि अब उन ताबीज़ों को बनाने वाले और इस उत्सव को आयोजित करने के लिए ज़रूरी बाकी सभी काम करने वाले लोग नहीं बचें हैं।
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ओकायामा का ‘सैदाईजी ईयो’ त्योहार

"ईयो" नामक एक खास समारोह है, जिसमें लगभग 10,000 पुरुष भाग लेते हैं और वे शिंगी (लकड़ी का ताबीज) के लिए एक-दूसरे से लड़ते हैं। यह समारोह जापान के ओकायामा प्रांत में स्थित सैदाईजी मंदिर में होता है और यह नए साल के दिन से शुरू होकर 14 दिनों तक चलता है। शिंगी ताबीज एक सुगंधित लकड़ी का छोटा टुकड़ा होता है, जिसकी लंबाई करीब 20 सेंटीमीटर होती है। इसे यिन और यांग की शक्तियों का प्रतीक माना जाता है और यह नए साल के दौरान मंदिर में होने वाली प्रार्थनाओं के जरिए एक सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं देता है। माना जाता है कि जिस व्यक्ति के पास यह ताबीज होता है, उसे पूरे साल भर का सौभाग्य मिलता है।
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फुकुशिमा का ‘हयामा-गोमोरी’

मून कैलेंडर के हिसाब से यह त्योहार आम तौर पर 16 नवंबर से शुरू होकर तीन दिन तक मनाया जाता है। कुरोनुमा तीर्थस्थल, जो फुकुशिमा शहर के दक्षिणी हिस्से में कानेज़ावा जिले में स्थित है यह एक गुप्त स्थान है। यह समारोह हजारों सालों से यहां मनाया जा रहा है, और इसमें देवता मनुष्यों को शगुन देते हैं। यह वही जगह मानी जाती है जहां देवताओं के धरती पर उतरने की बात की जाती है, जिसे ‘हयामा’ कहा जाता है। आमतौर पर यहां पर विजिटर्स को आने की इजाजत नहीं होती है, लेकिन सिर्फ त्यौहार के वक्त ही किसी को यहां जाने का मौका मिलता है, और यह मौका साल में एक बार ही आता है। इस त्योहार का उद्देश्य ईश्वर से उर्वरता और अच्छी फसल की कामना करना होता है। पिछले साल यानी 2023 में यह त्योहार 28 दिसंबर से 31 दिसंबर तक मनाया गया था, और इस साल यह 20 से 22 दिसंबर तक होने वाला है। यह भी पढ़े:
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