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Sakat Chauth 2026: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कल, जानें चन्द्रमा को अर्घ्य देने का समय

इस दिन भक्त सूर्योदय से लेकर चंद्रमा निकलने तक सख्त व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा से भगवान गणेश की पूजा करते हैं।
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Sakat Chauth 2026: सकट चौथ, जिसे संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी भी कहा जाता है, भगवान गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण हिंदू व्रत है। यह मुख्य रूप से माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए रखती हैं। यह व्रत (Sakat Chauth 2026) माघ महीने के कृष्ण पक्ष के चौथे दिन को रखा जाता है।

इस दिन भक्त सूर्योदय से लेकर चंद्रमा निकलने तक सख्त व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा से भगवान गणेश की पूजा करते हैं। शाम को चंद्रमा दिखने के बाद, प्रार्थना की जाती है, जिसके बाद व्रत पूरा होता है। ऐसा माना जाता है कि सकट चौथ पर सच्ची पूजा करने से बाधाएं दूर होती हैं, समृद्धि आती है और बच्चों की मुश्किलों से रक्षा होती है।

ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय
ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय

क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य राकेश पांडेय?

लखनऊ स्थित महर्षि पाराशर ज्योतिष संस्थान ट्रस्ट के ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय ने बताया कि माघ कृष्ण चतुर्थ्यां तु प्रादुर्भूतो गणाधिप:।। यह व्रत माघ महीने के कृष्ण पक्ष चतुर्थी को किया जाता है। इस वार संकष्टी गणेश चतुर्थी तिथि के दिन मंगलवार का दिन आश्लेषा नक्षत्र दिन 03:50 तक रहेगा उसके बाद मघा नक्षत्र भोग करेगी।

इस दिन प्रीति योग भी मिल रहा है इसलिए यह व्रत सर्वमंगलकारी है। इस व्रत को तिलकुटी एवं वक्रतुण्ड चतुर्थी व्रत भी कहते है। इस दिन बुद्धि-विद्या वारिधि गणेश तथा चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए।

Sakat Chauth 2026: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत कल, जानें चन्द्रमा को अर्घ्य देने का समय

जानें चन्द्रमा को अर्घ्य देने का समय

ज्योतिषाचार्य पं राकेश पाण्डेय ने बताया कि दिन भर व्रत रहने के बाद शाम को चन्द्र दर्शन होने पर दूध का अर्घ्य देकर चन्द्रमा की बिधिवत पूजा की जाती है। गौरी-गणेश की स्थापना करके उनका पूजन करके वर्ष भर उन्हें घर में रखा जाता है। इस दिन चन्द्रोदय का समय रात 08:35 के बाद है।

पं राकेश पाण्डेय बताते हैं कि नैवेद्य सामग्री, तिल, ईख, शकरकंद, अमरूद, गुड तथा घी से चन्दमा एवं गणेश जी को भोग लगाया जाता है। यह नैवेद्य रात्रि भर डलिया या पीले वस्त्र इत्यादि से ढंककर यथावत रख दिया जाता है, जिसे पहार कहते है। सुबह उस ढके हुए पहार को पुत्र ही खोलता है। पहार खोलने के बाद प्रसाद को भाई-बन्धुओं में वितरित करना चाहिए, जिससे आपस में प्रेम भावना स्थापित होता है। मातायें पुत्र तथा पति की सुख समृद्धि के लिए यह व्रत रहती है।

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